बन्दगी

बन्दगी

तेरी बन्दगी के सिवा कोई काम नहीं हैं,
इक पल का यहां आराम नहीं है।
सर झुकाना मेरी फितरत में न था,
झुकना सीख गया जो आसान नहीं हैं ॥

इन्सानी उलझनों से अलग हुआ तो जाना,
दुख में जीना यहां आसान नहीं है।
खुशी की छाया दिखे मुख पे जहां,
ग़म छुपाने वाला यहां महान् नहीं हैं॥

हर राह तेरे द़र पे ही खुले,
आंऊ कैसे मेरी कोई पहचान नहीं है।
तेरी भक्ति में डूबा रंहु रात-दिन,
दुनिया में ऐसा कोई ज़ाम नहीं है॥

तेरे पास आने में जो रोक ले कोई,
ऐसा यहां पर पैगाम नहीं है।
साथ मिलकर चलने का संदेश जो दे,
उस भक्ति के सिवा कोई काम नही है॥

तेरी बन्दगी के सिवा……..

‘विराज’

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"Poet"

2 Replies to “बन्दगी”

  1. “सर झुकाना मेरी फितरत में न था,
    झुकना सीख गया जो आसान नहीं हैं ॥

    इन्सानी उलझनों से अलग हुआ तो जाना,
    दुख में जीना यहां आसान नहीं है।”

    Sundar panktiya sir ji. Accha likhte hain aap.

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