बाल श्रम

बाल श्रम

 ये हमारी “नादानी” उन बच्चों के ‘किस्मत’ की ‘कुर्बानी’ है..
कभी उनकी मूठ्ठी खुलवाकर देखना;
किस्मत के नाम पर,
छाले मिलेंगे..

जो उन पर किये गये, हर एक दिन
हर एक ज़ूल्म की निशानी है..
श़र्म आती है,
कि ये हमारी ही नादानी है,

जब हम कहीं घुमने निकलते हैं;
तो ये बच्चे कहीं रोड पर खड़े,
तो कहीं कचड़े पर पड़े मिलते हैं…..
कलम की जगह कुल्हाड़ी पकड़े
कही भूख़ से बेहाल अकड़े मिलते हैं…

सन्तुलित शिक्षा-आहार,
और संतुलित सा प्यार..
बस यही;
एक जिन्दा बच्चे का;
“मूलभूत अधिकार”..

मिल नही पाता क्यूंकि
सारा माहौल कानूनी है…
सियास़त भी तब आँख खोलती है;
जब खड़ी हो चूकी होती परेशानी है..
श़र्म आती है ???????
कि ये ‘हमारी ही’ नादानी.
उन बच्चों के किस्मत की कूर्बानी है..

2 Replies to “बाल श्रम”

  1. सुंदर मार्मिक और भावपूर्ण , इस गहरे और महत्वपूर्ण विषय पर रचना
    प्रभावी लगी … इस स्थिति पर ज़बरजस्त करवाई की ज़रूरत है …!

    • सह्रद धन्यवाद है महोदय आपको 🙂 :).. और स्थिति बात पर लगता है 🙁 🙁 जनजागरण की जरूरत है और उसके लिए जनमुहिम छेड़ना होगा…

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