बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम

देखूं जब कोई निराश्रित शिशु का चेहरा
बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम
जान न पाया मेरा ये निष्ठुर ह्रदय कभी
क्यों हैं इस उदास चेहरे पर इतने गम

क्या यही गुनाह था उस मासूम का कि
निर्धन घर में हुआ इस बालक का जन्म
उसकी जिज्ञासा भरी आँखों से झरते
आंसुओं को क्या कभी पोंछ पायेंगे हम

क्या सपने उसके-क्या उसकी अभिलाषा
जा कर कोई पूछे मगर नहीं किसी में दम
निर्दयी ज़माने ने दिए जख्म उसको इतने
नहीं कोई वनस्पति जो कर दे उनको कम

काँटों भरी राह में पाँव उसके रक्तरंजित
चलते-चलते थक जायेंगे और जायेंगे थम
अलसाई सुरमई सांझ के ढलने से पहले
बून्द-बून्द बहते आंसू जायेंगे उसके जम

देखूं जब कोई निराश्रित शिशु का चेहरा
बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम
जान न पाया मेरा ये निष्ठुर ह्रदय कभी
क्यों हैं इस उदास चेहरे पर इतने गम

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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