बूढ़ी माँ

बूढ़ी माँ

वो आँखे किसी का दीदार करने के लिए तरस रही थी।उस बूढ़ी औरत के चेहरे पर बनी झुर्रियां इस बात का संकेत कर रही थी कि उस पर बुढ़ापा हावी होते जा रहा था।अचानक एक घंटी बजती हैं और वो इस बात का संकेत कर रही थी की किसीने दरवाजे पे बहुत दिनों बाद दस्तक दी थी ।वह बूढी औरत भगवान् का नाम स्मरण करते हुए’हाय राम’ कौन हैं?कहते हुए दरवाजे की तरफ अपने दबे पैरों से बढ़ती हैं और कोमल डाली जैसे हाथों से दरवाज़े की कुंठी खोलने का प्रयास करती हैं।जैसे ही वह दरवाजा खोलती हैं तो वह अपनी धुंधलाई हुई आँखों से देखती हैं तो उसको उसका लाल नजर आता हैं।वह अपने लाल को सहलाने और सीने से लगाने की कोशिश करती हैं तो उसका स्वप्न वही टूट जाता हैं और उसकी आँखों का समंदर फुट जाता हैं।उस बूढ़ी औरत का सुनील… सुनील…पूकारना उस वृद्धाश्रम की दीवारों तक ही सिमित रह जाता हैं।

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