बेगारी का वक़्त

बेगारी का वक़्त

कैसे हैं आप सभी। आज लिखने बैठ गया था मैं, पर कुछ था भी नहीं मेरे मन में। पर याद आया की हां लिखना तो आदत है मेरी कुछ ना कुछ।
जिंदगी में जब तक कॉलेज या पढाई का जो वक़्त होता है वो अत्यंत ही सुन्दर होता है। हर स्टूडेंट यही सोचता है कि इसके बाद ये करेगे,वो करेगे। उसे उस समय की पढाई में उतना मन नहीं लगता बल्कि वो भविष्य के सपनो में डूब जाता है। वो बस ये सोचता है की इतने पैसे कमाऊँगा जिसमे से कुछ घर भेजूगा, जिससे कुछ तो सहयोग दे पाउगा माँ बाप को।
पर वो जब फील्ड में उतरता है और जब हर जगह से निकाल दिया जाता है तो वो टूट जाता है उसके सपने टूट जाते है। वो हर तरफ से हताश हो जाता है, निराश हो जाता है। उसे लगता है की काश वही पढाई का दौर वापस आ जाता तो जिंदगी के सपने को फिर से बुन लेते। जो खो गया है अंदर ही अंदर में वो वापस से सुन लेते।
हर इंसान की जिंदगी में ऐसे ही दौर आते रहते हैं। पर कभी अपना भरोसा (जो खुद पर है), कभी खोना नहीं चाहिए। वक़्त बदलता है, हर इंसान का हर वक़्त बदलता है। बस उसे इंतजार करना होगा और लगातार मेहनत करनी होगी, चाहे जितनी भी असफलता आये।
कुछ पंक्तिया इसी भाव को महसूस कराती हैं–
आज जहाँ में फिर से हार के आया हूँ,
क्या हुआ जो खुद से कुछ ना पाया हूँ।
हर दोराहे पे खुद को खड़ा पाता हूँ,वक़्त बदला है,
शायद ये बदल समझ ना पाया हूँ।
दिन तो वैसे ही काट लेता हूँ ना जाने क्यूँ,
रात का गुजरना ना गुजार पाया हूँ।
तब खुश था जब हाथो में किताबो का बोझ था,
अब ये सुधरन वक़्त की, जान ना पाया हूँ।
चलो तुम कुछ पा लो, वक़्त हमारा भी आएगा,
क्या हुआ जो मैं साथ,तेरे ना चल पाया हूँ।
हां कह देना “मैकश”, जो बात लबो पे रह जाए,
आदत है मेरी , जो मैं ना कह पाया हूँ।

श्रेयस अपूर्व “मैकश”

2 Replies to “बेगारी का वक़्त”

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