बेसुध सन्नाटा

रात के बेसुध सन्नाटे में
मिला न कोई अपना
बेचैन आँखें ढूंढ रही थी
बचपन का खोया सपना
सहमे-सहमे थे सभी
पत्ता-पत्ता और बूटा-बूटा
धड़कनें भी थक गई थी
और दिल भी था टुटा-टूटा
सितारे भी डूबे उदासी में
चाँद भी था खोया-खोया
चांदनी धुंधली पड़ी थी
देवदार भी था सोया-सोया
मगर पग मेरे रुके नहीं
डिगा नहीं कर्म-पथ पर
विचलित न हुआ अंगारों से
चलता रहा अग्नि-पथ पर
क्योंकि छूनी थी मंज़िल
चंचल भोर होने से पहले
ज्वालामुखी को ललकारा
तूफान के रोने से पहले
रात के बेसुध सन्नाटे में
मिला न कोई अपना
बेचैन आँखें ढूंढ रही थी
बचपन का खोया सपना

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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