भविष्य का उपहास- रेखाओं में

क्या लिखूँ
दर्द-विरह के
घिसें पीटे आलाप
जिन्दगी की जंग
चाहत और
अपनी कमियों की
असफलता भरी
दास्ताँ, या फिर
सूखें आंसूओं में
काजल की धूली
परतों में छिपी
उलझे भाग्य फल की
व्यथित रेखाएँ
या माथे पर खींचीं
सलवटों में
अंकित कटी सी
कुछ आढ़ी तिरछी
बलायें, कटे-फटे
चिन्ह को उकेरे
लेख भाग्य के
हथेली पर एक
अजूबे का खेल
जो कभी भी
सही नहीं बतलाये
पर हरबार
जब भी हुआ हताश
इन पर ही विश्वास
तेज धार हथियार से
काटकर जैसे
बनाई गई हो
यह रेखाएँ
जीवन के
हर स्तर पर
कालीख़ लगा के
अंधकार भविष्य को
जताने
जैसे टूटी कलम से
बिन स्याही
विधाता ने किया
उपहास ।
रेखाओं में
सिमट गई तकदीर
जब की
जीवन की सम्पूर्णता
एक निरंतर प्रयास

सजन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.