भूल गया (ग़ज़ल)

पैमाना खा गया धोखा, अब्र शराब गिराना भूल गया,
जमीं तड़पती रही प्यासी, अब्र शराब गिराना भूल गया।

शायर ने ग़ज़ल से कहा, कभी ख्वाब में भी आया करो,
सारी रात ग़ज़ल लिखी, ग़ज़ल ख्वाब में आना भूल गया।

हुस्न ने शायर से कहा, कभी नजरें मिला लिया करो,
देखा जब हुस्न को, शायर नज़र मिलाना भूल गया।

कहकशाँ की महफ़िल में, मसरूफ था महताब भी,
रात उतर आई जमीन पर, चाँद निकलना भूल गया।

तुझसे रक़ाबत कैसे हो, जब तू ही मेरी तसव्वुर है,
तेरी परवाज़ देख कोहसार में, सांस लेना भूल गया।

हाथ में मशाल लिए, आई जलाने को कफ़न ‘एकांत’
दुखती रग को छू दीया और दिल धड़कना भूल गया।

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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