मनमोहना

सुरम्य निसर्ग, मुदित खग – विहग
तटिनी कूल पर झुकते विटप
भ्रमर का गान हो रहा मुखर
गुंजित मधुर संगीत के स्वर । ।

सुमधुर वेणु पर राग बन
थिरक उठा सुरों का तन
अप्रतिम आनंद छाया है वन
अद्वितीय उल्लास से पुलकित मन ।।

चहुँ ओर हैं गोपी – सखा
अद्भुत उत्सव की सी छटा
अनुरक्त प्रकृति, आसक्त धरा
सुकुमार कानूरा है सर्वत्र बसा । ।

अनिंद्य सौंदर्य अरु छवि मनोहारी
रूपकांति पर मुग्ध नर – नारी
चारु स्मित से मोह लिए गिरिधारी
सलोनी राधिका के प्रियवर बिहारी । ।

रहे अंकित हृदय में यह दृश्य अभिराम
अंतर्मन हो सुरभित ले कान्हा का नाम
नित नव्य लीलाएँ करें गोकुल धाम
वंदन यह अर्पण तुम्हें हे श्याम । ।

14 Replies to “मनमोहना”

  1. Bahut khubsurti se likha hai. Aisa lagta hai Hindustan Kay kisi Naamee Kavi nay ye Rachna Kari hai.
    Hum aapki is Rachna sai Bahut prabhavit huye.

    Subhash from Canada

  2. निधि बहुत सुंदर रचना है मन मुग्ध हो गया….बधाई हो

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