महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

बिखर भी जाने दो महकते गजरों को।

 

नशा पीने में नहीं, पिलाने में भी है

गौर से तो देख, साकी की नजरों में।

 

हादसा था वोह नाजुक से प्यार का

पर दहला गया है सारे शहरों को।

 

कातिल न था वो बस रखने आया था

मेरे सीने में अपने खंजरों को।

 

लजा जाता है अक्स भी आईने का

झुका लेता है वो अपनी नजरों को।

 

लौट आने की चाहत में अपने घर

खड़खड़ाता रहा वो तमाम घरों को।

 

उठी थी इक चिन्गारी दमन की मगर

जलाती गई जाने कितने शहरों को।

 

छलकते हैं अश्क इस तरह आँखों में

भिंगो देते हैं मय के तमाम कतरों को।

                   …. भूपेन्द्र कुमार दवे 

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