महसूस

कुछ दिनों की बंदिशों से आजाद हो जाओगी,
जो शायद मेरी दोस्ती में महसूस होती है तुम्हे.
ना पूछूँगा मैं तेरा हाल अब चाह के भी,
जो शायद मेरी आदत महसूस होती है तुम्हे.
फिर फ़साने लिख लेना किसी और के साथ में,
जो मेरे साथ एक बगावत महसूस होती है तुम्हे.
मेरे दिल की खिड़किया फिर ना खुलेगी तुम्हारे वास्ते,
जो शायद मेरे साथ कब्रगाह महसूस होती है तुम्हे.
मेरे हालातो को छोड़ दो और चले जाना आज जैसे,
जो शायद मेरे साथ पराया महसूस होती है तुम्हे.

श्रेयस अपूर्व
भोपाल

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