माँ का लाडला (वीर शहीद)

माँ का लाडला (वीर शहीद)

(यह दिव्य कविता गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में भारत माँ के वीर शहीदों को दिल से समर्पित करता हूँ|)

जब माँ का बंटवारा हो रहा था,
किसी के हिस्से पंजाब, किसी के हिस्से हिमाचल आया।
मैं पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा था,
मेरे हिस्से भारत माँ का आँचल आया।

शहीद पड़ा था जब चिर-निद्रा में,
कोई दो गज कफ़न, कोई कठौती में गंगा लाया।
माँ ने सहेज कर रखा था जिसे वर्षों से,
में लहरा कर वह तिरंगा लाया।

धधक रही थी चिता जब शहीद जवान की,
शोक जताने कोई देशभक्त, कोई नेता बेईमान आया।
मेरा शीश झुका और आँखें नाम पड़ी थी,
शहीद को श्रद्धांजलि देने, मैं दिल में राष्ट्रगान लाया।

शांत हो गई जब चिता वीर सपूत की,
कोई सेल्फी तो कोई उठाकर ख़ाक लाया।
शहीद की वीर गाथा अपने बच्चों को सुनाऊँ,
तो मैं उठाकर दो चुटकी राख लाया।

हो रही थी जब शोक सभा शहीद की,
कोई नकली आंसू, कोई सांत्वना का मरहम लाया।
मैं अनजान था इन सब ढकोसलों से अब तक,
लिखकर मैं माथे पर वन्दे-मातरम लाया।

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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