माँ बाप की सहनशक्ति

बचपन का तो एक अलग रूप है
माँ की ममता के कोख में आने के आगे
माँ के हर पल को सच करते हुए
माँ को असहनीय दर्द से रुलाते हुए
खुद भी माँ के साथ रोते हुए
माँ की कोख में आता है बचपन
माँ को मुस्कुराते हुए देखकर
बचपन महसूस करता है
माँ को हमेशा खुश रखेगा
माँ के साथ आँख मिचोनी खेलते हुए
दुनिया भर की शरारत करते हुए
माँ के प्यार को अपनाते हुए
दादा दादी के जीवन की साध मिटाते हुए
बाप को घोड़ा बनाकर सवारी करते हुए
बचपन से किशोरावस्था में जाते हुए
जिंदगी के हर पड़ाव पर रुकते हुए
समय के साथ ताल मिलाते हुए
बचपन की यादो को झोली में डालते हुए
नए नए दोस्त बनाकर पुराने दोस्तों को भूलते हुए
स्कूल से कॉलेज की तरफ कदम बढ़ाते हुए
जीवन की सच्चाई का सामना करते हुए
अपनी मंज़िल को तय करते हुए
बचपन की यादो यादगार समेटे हुए
सपनो के महल वास्तबिक करते हुए
माँ के क़र्ज़ को चुकाने की सोच बनाते हुए
बढ़ता रहता है एक अनजान को अपना बनाते हुए
बड़े बड़े सुनहरे सपनो में बहते हुए
माँ बाप के प्यार को भी सपना सोचते हुए
वह और उसकी जीवनसाथी नए रंग में डूबते हुए
एक नए बचपन को जन्म देते हुए
पत्नी के असहनीय दर्द को महसूस करते हुए
तब उसे एहसास होता है वह क्यों भूल गया था
अपने बचपन को अपनी स्कूल से कॉलेज यात्रा को
वह रोते बिलखते हुए अपने नए जन्म को लेकर
भागता है माँ बाप के पास सुबकते हुए
माँ मुझे माफ़ करना मुझे ऐसा सबक सिखाना
जैसे और कोई माँ बचपन को कोख में ना लाये
माँ बाप कंहा होश था उसकी बाते सुनने की
वह तो मस्त हो गए थे नए बचपन के साथ
माँ बाप होते ही ऐसे जो सब कुछ सह सकते है
पर बेटे को नहीं भूल पाते है चाहे जैसा ही क्यो ना हो
—–प्रेमचंद मुरारका

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