मिले जब कोई अजनबी

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में,
जब कोई अजनबी मिल जाता है।
विरान चमन में न जाने क्यों,
एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है।

तनहाई में सोये अरमानों संग,
चुलबुला दिल भी बहल जाता है।
अब तो बिना उसकी कल्पना के,
जिंदगी का हर पल दहल जाता है।

जब वह अपने उष्ण अधरों से,
कोमल कपोलों को चूम लेता है।
चंचल आषाढ़ की अंगड़ाई में,
अधीर चातक भी झूम लेता है।

चलते-चलते टेढ़ी-मेढ़ी राह पर,
जब कोई चेहरा मिल जाता है।
अनायास ही खोया हुआ बचपन,
मचल कर फिर से खिल जाता है।

जब देखूं चेहरा उस अजनबी का,
कोई पराया भी अपना लगता है।
हाथ थामे चलता जब वह संग मेरे,
अत्तीत का कोई सपना लगता है।

भीड़ में मिला जब ये अजनबी,
असंभव मंज़िल भी छोटी लगती है।
उड़ूँ संग उसके हिम शिखर पर,
दुनिया हिमालय की चोटी लगती है।

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में,
जब कोई अजनबी मिल जाता है।
विरान चमन में न जाने क्यों,
एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है।

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |