मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

मेरे चेहरे पर मेरा ही चेहरा रहने दो

जब तक खुद वो अपने गुनाह ना कबूल करे

तुम इन गवाहों को गूंगा बहरा रहने दो

कितनी मिन्नतों के बाद ये बहार आयी है

अब मौसम न बदले हवा का पहरा रहने दो

वो बूढ़ा शजर चिड़ियों का बड़ा प्यारा है

अब के खिजां में कुछ पत्तों को हरा रहने दो

गूंगे बहरे का एहसास जरा न होने दो

होठों पर सन्नाटा तुम भी गहरा रहने दो

मेरी मां के आंसू अब और न बहने दो

मेरी फोटो पर गुनाह का कुहरा रहने दो

—– भूपेंद्र कुमार दवे

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