मुसाफिर! ख्वाब कोई नया चुन

जिन्दगी के लम्बे सफर में मुसाफिर,
फिर से ख्वाब कोई रुपहला चुन।

संवार कर अपने ख्वाबों के टूटे तार,
रच ले ख्वाबों की कोई सुरीली धुन।

मंडराए जब अँधेरा तेरे कर्मपथ पर,
रुक कर मासूम ख्वाबों की भी सुन।

जोड़ कर टूटे धागे बिखरे ख्वाबों के,
रेशमी धागों से ख्वाब कोई नया बुन।

दुर्गम डगर में ललकारे जब शत्रु तुझे,
कर्मों के अग्निकुंड में तू उसको भुन।

दीमक बन जो करे धीमी तेरी चाल,
उमंग के पसीने से मिटादे सारे घुन।

मुसाफिर! मंज़िल तेरी राह ताकती,
ख्वाबों में से कोई ख्वाब दिव्य चुन।

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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