मुस्कानें

मुस्कानें

अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला
सबकी आँखें नम दिखती थी
मैं मुस्कान सजाने जब निकला।

मूक बनी बिखरी आवाजें
सबके लब पर थर्राती थी
जंजीरों में बंधी उदासी
सबके दिल को कलपाती थी

मैंने चाहा महके जग तो
मुस्कानें खिलने शर्माती थी।
अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला।

नाव उतारी जब जब मैंने
तूफान उठा था उलझाता
लहरों के आँचल में बिंधकर
था आँसू मोती दमकाता

मैंने चाहा उनको चुनकर
हर मुस्कानों की दमक बढ़ाता
अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला।

जहाँ तहाँ जीवन के पथ पर
साँसें बस विप्लव करती थी
ऊपर नीचे, नीचे ऊपर
अल्हड़ आँधी सी चलती थी

मैंने इनको थपकी देकर
शांत चित्त सी मति गति दी थी
अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला।

नाविक होकर तूने सबको
नाव पुरानी ही दे डाली
पूर्वजन्म की टूटी काठी
ले नाव बनाई थी बासी

मोक्ष मिलेगा कहकर मैंने
मुस्कानें जीवित कर डाली
अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला।

हर माँ ने भी खुशी जताने
ममता का आँचल फैलाया
हर आँसू था उसका पावन
जो सबके तन-मन को भाया

मैंने तब खंड़ित जीवन को
मुस्कानों का श्रंगार दिलाया
अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला।

मगर किनारे बैठा मैं ही
साँसों की गिनती भूल गया
खंड़ित नाव के टुकड़े भी मैं
चुनते चुनते बस ऊब गया

झूठी मुस्कानों के बल पर
अपनी अर्थी खुद ही ले निकला
अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला।

मुस्कानें जीवित करने की
चाह अधूरी ही बनी रही
जग जैसा था, वही रहा वह
मुस्कानें खिलना भी भूल गयी

और निराशा के बादल में
बारिश अश्कों की थम न सकी
अनजानों में अनजान बना
पहचान बनाने जब मैं निकला
… भूपेन्द्र कुमार दवे
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