मेघदूत

दूत, अति प्रिय दूत,
नभ में विचरते अद्भुत
कालिदास की कल्पना के मेघदूत

कर दो ना मेरा एक काम छोटा सा
पंहुचा देना प्राणप्रिया को संदेशा
तुम बिन है उदास, जल बिन मछली सा

विचारों के धूप छांव तले
नभ में जब बादल डोले
अन्तर मन कवि की कल्पना में बोले

रंगीन कोई सपना
लाचारी में विरह अगन जलना
कारण तुम बनो, मेरा संदेश पंहुचाना

समय की धारा बहे अविराम
प्रिया बिन न दिल को चैन न आराम
हे मेघ, असहाय हूं, करो ना दूत का काम

काले कजरारे बादल में बिजली चमके
धड़कन हिया में प्रेयसी के लिये धड़के
बरसा की शीतल धार में धरा सा मिलन चाहके

तुम विचरण करते एक ठोर से दूसरे ठोर
हर विरही की मनोव्यथा समझते पुरज़ोर
मेरे लिए भी बनो दूत, न बनो इतने कठोर

हे दूत, मेघदूत, अति प्रिय दूत
“यक्ष” का विरह, कवि की रचना से अभिभूत
“मालविका” सी मेरी प्रियतमा, नहीं अछूत

तुम्हे बनना होगा दूत…………..

सजन

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