‘मेरा प्यार’

मेरा प्यार

जो तुम्हें ना कह सका,
वो मेरे प्यार का फसाना था,

समझती तुम भी कैसे इसे,
ये रोग मुझे पुराना था,

हिम्मत जब भी हुई,
तो सिर्फ तेरी गैर-मोजुदगी में,

कह देता था सब-कुछ,
तुम्हें जो भी समझाना था,

इक खुशनुमा माहौल था बीता,
मेरा-तेरी तस्वीर संग,

तु कहती कुछ ना थी,
ना ही मुझे कुछ जताना था,

इक पुराना सा घर था,
जिसमें कोई ओर नहीं था,

बस तुम थी, मैं था,
ओर इक ‘आईना’ पुराना था,

तेरी जरुरत सी महसूस होती,
इस वीरान जीवन में,

कितना प्यार है दिल में,
सब तुमको बताना था,

कितने मोती डूब गये,
इस प्यार के सागर में,

यही दाव था तुझपर मेरा,
डूब जाना था, या उभर जाना था,

समझ गए ग़र प्यार को,
तो लौट आ यहाँ,

मुझे अपना हर वक्त,
अब तुझ संग बिताना था ॥

‘विराज’

About "विराज़"

"Poet"

8 Replies to “‘मेरा प्यार’”

  1. “बस तुम थी, मैं था,
    ओर इक ‘आईना’ पुराना था,”.
    अत्यन्त मार्मिक पंक्तिया हैं।
    सुन्दर लिखा सर जी।

  2. समझ गए ग़र प्यार को,
    तो लौट आ यहाँ,
    मुझे अपना हर वक्त,
    अब तुझ संग बिताना था ॥

    वाह साहब वाह मज़ा आ गया

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