मेरी इकलौती परछाई

मेरी इकलौती परछाई

गुजरा जब तेरे हुस्न का काफ़िला
हवाओं के संग मेरे गाँव से होकर
बादल भी चले संग तेरे-तेरे और
बदला मौसम का भी मिज़ाज़
लेकिन हम न कर सके दीदार
तेरे हुस्न के चाँद का
क्योंकि उन रुपहले पलों में मैं
रात के घने अँधेरे में, बलखाती सन्नाटे की
उबड़-खाबड़ पगडंडियों किनारे
खोज रहा था अपनी ही परछाई को
जो शायद तुम्हारे हुस्न की तरुणाई देख
सिमट गई थी कहीं
रात के सन्नाटे के अंचल की ओट में
कुछ शर्माकर-कुछ सकुचाकर
खोकर तुम्हें अब नहीं खोना चाहता
अपनी इकलौती परछाई को
जो चलती है हरदम संग मेरे
जैसे छोड़ा था हाथ तुमने मेरा एक दिन
किसी गैर के लिए
नहीं चाहता कि
मेरी परछाई भी छोड़ दे साथ मेरा
किसी गैर की खातिर एक दिन
मेरी हमदम, मेरी हमसफ़र
मेरी इकलौती परछाई

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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