मेरे अंतः की आशायें

मेरे अंतः की आशायें
हरदम किलकारी भरती हैं।

मैं धूल बनूँ या फूल बनूँ
बिखराव तपन-सी रहती है
सुनसान अंधेरे पथ पर भी
कुछ घड़कन दिल की बढ़ती है।

पर आशा की लहरें तब भी
चंचल मन में आ बसती हैं।
मेरे अंतः की आशायें
हरदम किलकारी भरती हैं।

तुमसे हटकर दूर चलूँ तो
सफर विकट-सा बन जाता है
और अकेला निकल पडूँ तो
पथ अनजाना बन जाता है।

पर इन घड़ियों में भी आशा
तेरा रूप लिये रहती है।
मेरे अंतः की आशायें
हरदम किलकारी भरती हैं।

मैं तट पर जा लहरें गिनता
भूल गया था साँसें गिनना
क्रोध भरी जब आँधी आयी
भूल गया मैं उठकर चलना

पर चला-चली की आँधी में
आशायें अल्हड़ रहती हैं।
मेरे अंतः की आशायें
हरदम किलकारी भरती हैं।

कब तक यह मधुऋतु प्यारी
रूप रंग का श्रंगार करेगी
औ वसंत में भींगे तन में
महक साँस की भरा करेगी

पर पतझर की थकी छाँव में
आस बिचारी फिर भी रहती हैं।
मेरे अंतः की आशायें
हरदम किलकारी भरती हैं।

जब सुमनों से चुरा चुराकर
कुछ पराग से प्राण भरूँ मैं
फिर उर में विकसित वाणी में
मन के सुर नादान भरूँ मैं

तब जो गीत सजे जीवन के
श्रंगार उसी से ये करती हैं।
मेरे अंतः की आशायें
हरदम किलकारी भरती हैं।

अंत समय साँसें थकने पर
बिखरे सपने और डराते
झुकती जाती उमर डरी-सी
दाँत टूटते पग लँगड़ाते

तब संघ्या की त्रस्त किरणें
कुछ आस किरण की रखती हैं।
मेरे अंतः की आशायें
हरदम किलकारी भरती हैं।
…. भूपेन्द्र कुमार दवे

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