मेरे गीतों की बगिया में

मेरे गीतों की बगिया में

मेरे गीतों की बगिया में
तू बसंत-रुत बन खेला था।
सत रंगी फूलों से सुर ले
तू रचता जीवन मेला था।

राग-रागिनी पूर्ण हुई जब
अंतिम गीतों की बारी थी
तू पतझर बनकर आ बैठा
जब महकी यह फुलवारी थी।

तोड़ गया तू उस डाली को
जिस पर मेरा डेरा था
मेरे गीतों की बगिया में
तू बसंत-रुत बन खेला था।

सोचा था तू खगवृन्दों का
गीत सुरीला बन आवेगा
गूँज उठेगा गीत बाग में
सुर जब मेरा सध जावेगा।

सुप्त हुआ पर भक्ति भाव जो
तेरी वीणा से जागा था।
मेरे गीतों की बगिया में
तू बसंत-रुत बन खेला था।

सुन्दर था परिधान सुरों का
राग-रागिनी सब मोहक थी
हर गीतों के रस में डूबी
वीणा वाणी भी साधक थी।

तूने तब तज मेरा तन मन
व्याकुल प्राणों को छेड़ा था।
मेरे गीतों की बगिया में
तू बसंत-रुत बन खेला था।

तितली भ्रमरों ने भी मिलकर
नृत्य अनोखा कर दिखलाया
झूम उठी थी लता बेल जब
पवन वेग ने मन ललचाया।

खंड़ित करने सुखक्षण सारे
तूने मेघों को टेरा था।
मेरे गीतों की बगिया में
तू बसंत-रुत बन खेला था।

तेरी पदध्वनि भी ऐसी थी
जिसमें था रस मृदु पायल का
गीतों के कंठों में भी था
बोल सुरीला कोयल का।

रही आरती आधी अधूरी
जब धुँआ दीप पर खेला था।
मेरे गीतों की बगिया में
तू बसंत-रुत बन खेला था।

..…. भ्रूपेन्द्र कुमार दवे
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