मेरे गीतों के आँचल में

मेरे गीतों के आँचल में

मेरे गीतों के आँचल में

नटखट सुर कुछ आ जाने दो

लहरों का कंपन स्पंदन भी

सागर में जा मिलने दो।

 

हो प्रभात भी सुखकर ऐसा

कलरव करते खगगण जैसा

और किरण की मादकता भी

ओस कणों में छा जाने दो।

 

निर्जन वन में कूक रहे जो

उनकी गुंजन मिल जाने दो

मेरे गीतों के आँचल में

नटखट सुर कुछ आ जाने दो

 

ओम् शब्द की प्रतिध्वनि प्रखर

करे शब्द का उद्घोष अमर

और गीत जब जब गूँजे तो

जग जीवन मुखरित होने दो।

 

माटी के नश्वर पुतलों को

मानवता से सज जाने दो

मेरे गीतों के आँचल में

नटखट सुर कुछ आ जाने दो

 

गर जीवन के क्षण निष्ठुर हों

व्यथा वेदना के अक्षर हों

तब भक्ति के पवन शब्दों को

कर्म धर्म में धुल जाने दो।

 

नम पलकों का वैभव सुन्दर

आँसू बन बस झर जाने दो

मेरे गीतों के आँचल में

नटखट सुर कुछ आ जाने दो

 

मन की गति गर मुक्त नहीं हो

पाप-पुण्य का ज्ञान नहीं हो

तब सहज हर सोच को करने

कुछ चिंतन रुचि बढ़ जाने दो।

 

दिव्य भाव कर्मों में भरने

इन गीतो को सज जाने दो

मेरे गीतों के आँचल में

नटखट सुर कुछ आ जाने दो

 

प्राण बसे हों जिस जिस तन में

दीप बुझे हों व्याकुल मन में

वहीं गीत को रम जाने दो

चंचल सुर कुछ आ जाने दो।

 

गूँज उठे जो मानव मन में

यह गीत वही बन जाने दो।

मेरे गीतों के आँचल में

नटखट सुर कुछ आ जाने दो

… भूपेन्द्र कुमार दवे

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