मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो

मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो

तुम शब्दों में अर्थ जगाकर संस्कार जगा दो।

 

शब्दों की झंकार तुम्हीं हो

प्राणों की हुँकार तुम्हीं हो

श्रद्धा का विस्तार तुम्हीं हो

करुणा की पुकार तुम्हीं हो।

 

झंकृत कर मधुर स्वर तुम अपनी वीणा के

मेरे भी गीतों में श्रद्धा की गूँज निखार दो।

 

खगवृन्दों के स्वर गुंजन की

किलकारी गीतों में भर दो

ले भ्रमरों से यौवन उन्माद

शब्द पुष्प में कुछ रस भर दो।

 

चेतनता की प्रखर प्रभा से आलौकित करने

कवि के मृदु हृदय में शक्ति का संचार करा दो।

 

मस्त पवन के प्रणय तेज को

गीतों में परिभाषित कर दो

अमृत-सा नित चुम्बन बरसाती

पंक्ति सभी क्रीड़ारत कर दो।

 

चुन श्रद्धा सुमन सभी कल्पलोक की बगिया से

पूजा में अर्पित पुष्पों का अंबार लगा दो।

 

मेरे गीतों की पंखुड़ियों को

तेरे चरणों पर झरने दो

पाकर महक चरणकमलों की

सारतत्व इनमें रमने दो।

 

मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो

तुम शब्दों में अर्थ जगाकर संस्कार जगा दो।

….  भूपेन्द्र कुमार दवे

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