मैं अकेला

मैं अकेला

आया हूँ मैंअकेला,रहना अकेला चाहता हूँ
इस दुनियादारी के झमेले में नहीं उलझना चाहता हूँ

अपने दिल का गुणगान औरों से नहीं चाहता हूँ
इसलिए शायद खुदको मैं अकेला ही पाता हूँ

चाहता हूँ अकेला रहकर कुछ लिखा करूँ
अपने मन की व्यथा का मैं खुद ही गुणगान करूँ

देख कर प्रकृति की सुंदरता मैं खामोश रहता हूँ
इसका मधु अपार, शायद इसको ही पिया करूँ

आते हैं जीवन में सुख और दुःख अपार
मैं उस अड़िग, कठोर, पेड़ की तरह खड़ा रहूं

ना सुख मुझे बहलाएगा,ना दुःख मुझे सतायेगा
युवा हूँ,पलट कर वायु मैं बन जाऊँगा

जानता हूँ ढल जाएगा ये यौवन,फिर क्यूँ करू मैं गुरुर
शायद इसी लिए हर वक्त रहता हैं मुझे जीने में शुरुर

दोस्त हैं इसलिए महफ़िल नहीं सजाता हूँ
दोस्त नए बनाने को महफ़िल मैं सजाता हूँ
आया हूँ अकेला,रहना मैं अकेला चाहता हूँ

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