मैं एक माँ खोजा करता हूँ

सभी को मेरा प्रणाम।सभी को नवरात्रि पर्व की शुभकामनाये।
परन्तु मेरी ये सिर्फ इतनी विनती है की माँ दुर्गा तभी खुश होंगी जब आप उनकी मानवीय अवतार अर्थात “माँ” को पहले पूजेंगे।
मैं कोई आदर्शवादी नहीं हूँ और हकीकत में मुझे दिखावा नहीं आता, परन्तु अगर इंसानियत या फिर समाज के इस दौर में देखें तो पहले “माँ” को पूजिए,उनकी सेवा करिये,”माँ दुर्गा” का आशीर्वाद खुद ही फलीभूत होगा।(कृपया इसे अन्यथा ना लें)
चलिए एक ग़ज़ल प्रस्तुत है जिसमे मैंने “माँ” के बहाने से “माँ दुर्गा” की भी पूजा कर ली है।मेरी ये ग़ज़ल उन सभी माँओं के लिए एक चरण स्पर्श है,जिन्होंने हमेशा मुझे ममता से सींचा है।
(माँ,बड़ी मम्मी,आंटी(अभिनव की मम्मी),मैम(रजनीश सर की धर्मपत्नी,आंटी(नारायण कहने वाली मेरी माँ),बड़ी मासी,छोटी मासी)– ये आप सभी के लिए।
प्रणाम सहित,आशीर्वाद वांछित।

खुश तो बहुत हूँ जिन्दा होकर पर,मैं सुकूँ खामखाँ खोजा करता हूँ।
यूं तो हूँ मैं एक बेटा पर,खुद में मैं एक माँ खोजा करता हूँ।

माँ,अम्मी,बेबे,मम्मी,इन सब में बस उसको पुकारा है,
कैसे कोई नाम मैं दूं,एक मुट्ठी में आसमाँ खोजा करता हूँ।

याद है वो सुबह मुझे,जब माँ कहती थी उठ जाओ अब,
उस सुबह का फिर से अब,मैं एक निशाँ खोजा करता हूँ।

माँ ने ही तो सिखाया था,गर हाथ झुके, सर झुक जाए,
वो तौर तरीके कहाँ से लाऊँ,अब मैं परेशाँ खोजा करता हूँ।

जीवन की इस बगिया में,मैं अमरबेल वो संचय है मेरा,
उसमें ही तो जीवन का अमृत,जाने मैं कहाँ खोजा करता हूँ।

उसको ही दुःख होता है,जब मैं भूखा प्यासा रह जाऊं,
मेरी तकलीफ से वाकिफ है माँ,क्यों मैं जहाँ खोजा करता हूँ।

हिचकी मुझको ना आती हो,पर ध्यान सदा उसका मुझमे,
उसमे ही तो महफ़िल रहती है,जाने मैं बियाबां खोजा करता हूँ।

धरा ये धामन हो चली है,अपने ममता के आँचल से,
उसका ही तो एक अंश हूँ,जाने क्यों एक जाँ खोजा करता हूँ।

कहता हूँ “मैकश” बात यही, जरा गौर से सुनना तुम भी,
हां ये सच है की ग़ज़लों में भी,मैं एक माँ खोजा करता हूँ।

“मैकश”

2 Replies to “मैं एक माँ खोजा करता हूँ”

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