मैं तो फकत शून्य था

मैं तो फकत शून्य था

सृष्टि के बीज से फूटा था
इक नन्हा अंकुर
नीले नभ तले लेता था सांस कोई
जैसे पंखुड़ी पहली खिली हो
बसन्त के पीले आँचल में
याद कर तूने ही बोया था
बीज इस अंकुर का
मैं तो मात्र शून्य था
ये तू ही तो था
भरे प्राण जिसने
इस निष्प्राण में
मेरा तो अस्तित्व था नगण्य
बनाया क्यों तूने इसे परिपूर्ण
कण-कण में सांस तेरी
पग-पग पर छाँव तेरी
जिस डगर चलूँ
पाऊँ तेरा ही प्रतिबिम्ब
मैं तो केवल शून्य था
रहा सदा इस भ्र्म में
जैसे स्वयं को रचा हो मैंने
बंद थी आखें मेरी
अहंकार के आडम्बर में
खुद को जकड़ लिया
अपने ही बनाये जंजीरों से
सागर की लहरों में झूलता रहा
जैसे बिन पतवार का मांझी
व्यर्थ थमाई तूने साँसों की डोर
इस गतिहीन जीवन को
निरर्थक कर्मों की आहट से भी अब
गूंजते स्वर अर्थहीन
ये माटी हुई अनुर्वर
कैसे फूटे कोई अंकुर
शिथिल किरण खोजती कोई प्राण नूतन
निष्प्रयोजन बहती बयार
निष्क्रिय हुई नदी की धारा
उपवन ढूंढे बसंत नया
क्यों दिया तूने किनारा
डूबती कस्ती को
अभिलाषा अब यही कि
बना दे शून्य को फिर से शून्य
क्योंकि मैं शून्य ही तो था
शून्य से शिखर तक
बस तेरी ही पटकथा
चाँद और सूरज जोहते
सांझ-सवेरे बाट तेरी
अन्धकार और उजाला भी
करते स्नान तेरे ही दिव्य रंग में
हैसियत नहीं थी मेरी
छू लूँ तेरे प्रकाश को
मैं तो फकत शून्य था
(किशन नेगी ‘एकान्त’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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