मैं पथिक अज़नबी

इन अनजानी राहों में
देखो कोई आ रहा है
देखो कोई जा रहा है
मन में कोई गीत गुनगुना रहा है
कुछ विरह के, कुछ तड़पन के
इन दुर्गम पगडंडियों में
देखो कोई गिर रहा है
देखो कोई चल रहा है
मन में कोई गीत गा रहा है
कुछ मायूसी के, कुछ उमंग के
इन अज़नबी हवाओं में
देखो कोई बहक रहा है
देखो कोई महक रहा है
मन में कोई गीत छेड़ रहा है
कुछ मिलन के, कुछ बिछुड़न के
इन अँधेरी गलियारों में
देखो कोई भटक रहा है
देखो कोई संभल रहा है
मन में कोई गीत बुन रहा है
कुछ एकाकीपन के, कुछ तनहाई के,
फिर भी मैं चलता रहा
बनकर एक अज़नबी पथिक
इन अपरिचित राहों में
इन अनजानी गलियों में और
ये अविरल यात्रा थकेगी नहीं
चिरकाल तक, अनंत काल तक

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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