मैं बहकना सीख रहा हूँ

जितना भी टूट चुका हूँ,उतना ही जुड़ना सीख रहा हूँ।
हां ये सच है जिंदगी मैं अब,सुधरना सीख रहा हूँ।
तुझे बुलाकर पास यहाँ, खुद को वापस भेज दिया,
अब तक सबको मंजूरी दी,अब मुकरना सीख रहा हूँ।
जो तेरी शिकायत है ना मुझसे,मेरे दूर ही रहने की,
देख हवा को बलखा कर तुझसे,अब गुजरना सीख रहा हूँ।
जो वजह दी दलील में,की क्यों जुदा हुए थे तुम,
सच बताता हूँ आज भी,मैं उबरना सीख रहा हूँ।
नीरस मेरी ग़ज़ल को सुन,ये कहता चला चल साथ में,
हां है ये सच मेरे मुन्तजिर,मैं लिखना सीख रहा हूँ।
गर वक़्त का तकाजा है तो,मंजूरी तुम्हे बिछड़ जाने की,
अब कैसे बताऊँ हाथ छुड़ाकर,मैं बिछड़ना सीख रहा हूँ।
जानते हैं ये फूल कली ये बगिया ये उपवन दिल के,
तुमसे ही तो गंध को लेकर,मैं महकना सीख रहा हूँ।
मय को ना हाथ लगाते मैकश,फिर भी सुरूर जो तेरा है,
वाजिब अब तेरी यादों में पीकर,मैं बहकना सीख रहा हूँ।

“मैकश”

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