मैं रोऊँ

मैं रोऊँ

मैं रोऊँ या गम में बिखरु,अब तेरा जाता है क्या,
मुझे भुला के सूने जग में,तू आखिर पाता है क्या।

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हर दिन ही रुकेगा यहाँ पे मगर, रौशनी भी भटकती रहेगी सदा,
ख्वाब आँखों से निकला करेगे अगर,चांदनी भी सिसकती रहेगी सदा।
रूठे रहे ज़माने वाले,या रूठा रहे खुदा भी कह,
तेरा आखिर मुझसे नाता है क्या?
मैं रोऊँ……..

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हां जो पूछा जो होता तो कहते भी हम,
कि आंसुओ से घटाए ये भर जाएँगी।
तुम जो आये ना आये फिकर अब नहीं,
ये सदाये हमारी भी मर जाएंगी।
आये,गए,रुके औ ठहरे,आज बता,मेरे दिल में,
तेरा आखिर “खाता ” है क्या?
मैं रोऊँ……….

श्रेयस अपूर्व
भोपाल

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