‘मै अपना कल बुनना चाहता हूं..’

बुनियाद जीवन की,

अतीत ही  होती है,

अनुभव सुख-दुख,

आशा-निराशा से,

परिपूर्ण होती है..

 

जिसे मानकर मै नींव

आने वाला कल बनाना चाहता हूं.

एक दृढ़ मनोबल, एक चाह,

एक उम्मीद लिए,

मै जीवन पथ पर आगे बढ़ना

चाहता हूं,

हां!मै अपना कल बुनना चाहता हूं..’

 

कल जो की आने वाला है,

उसकी सुखद कल्पना,

सपने पूरी होने का  दौर,

किसे अछा नही लगता होगा ?

इसलिये आने वाले  कल के लिये,

मै आज से सोचना चाहता हूं,

अरे! हां,

मै अपना कल बुनना चाहता हूं..

 

जीवन के पहलूओं  को,

जो पहेलियों की तरह है,

उलझते हुए उसमें,

उसे सुलझाना चाहता हूं,

हां!मै अपन कल बुनना चाहता हूं…

 

बनाकर हार को  प्रेरणा,

असफ़लता को कोशिश,

मुश्किलों को मित्र और

असम्भव को सम्भव बनाकर,

मै आगे चलना चाहता हूं,

सच! है

मै अपना कल बुनना चाहता हूं..

 

अपने शव्दो के प्रयोग से,

स्वप्न को सार्थकता मे,

और अपनी किस्मत को,

अपने हाथ उकेरना चाहता  हूं,

और मन मे एक अद्भुत सा,

संतोष लिये,

मै  चलते रहना  चाहता हूं,

हां!मै अपना कल बुनना चाहता हूं..”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*