मै खोजती अस्तित्व

मै खोजती अस्तित्व

किया आह्वान भागीरथ ने मेरा
मुक्त हुई ब्रह्मा के कमन्डल से जन कल्याण के लिये,
धारण किया रुद्र ने मुझे निज जटाओं पर
जब मैं धरा पर आई,
था मुझमे अपार स्नेह और मातृत्व,
किंतु विवश मै आज खुद खोजती अपना अस्तित्व l
जन मानस का उद्धार कर सदियों से निर्मल अविरल बहती आई,
था औषधीय अमृत तुल्य मेरा नीर कहीं गंगा कहीं भागीरथी मैं कहलाई l
था शूरवीर मेरा ही सुत अजेय भीष्म महाभारत में,
नही था जिसके बाहुबल का कोई शानी उस भयंकर महासमर में l
कभी था मेरे नीर का प्रवाह स्वच्छ अविरल,
पापियों के पाप धोते – धोते आज मिलिन हो गया मेरा जल l
विचरण था मेरा स्वछन्द धरा पर,
धर्म और आस्था का केन्द्र था मेरा किनारा,
जहाँ जन्मी संस्कृति और सभ्यतायें,
पाती आशीष जहाँ सुहागिन और मायें l
जहाँ विचरते थे कभी खग वृन्द,
पडी आज वह अविरल धारा मंद l
अवतरित हुई मैं धरा पर जनकल्याण के लिये,
पर हुआ दोहन मेरा निज स्वार्थ के लिये,
समय का कुचक्र चला कुछ ऐसा हुआ स्वरूप नाला जैसा,
आज मै मोहताज निज कल्याण के लिये l
यह सच है कि अवतरित हुई धरा पर मैं निश्चित अवधि के लिये,
किन्तु हे मानव विवश किया तूने मुझे समय पूर्व विदा होने के लिये l
नही रहा मुझमे अब वह अमृत्व,
ना होता स्नान से कोई पावन पतित्व,
आज मै खुद खोजती अपना अस्तित्व l

About ओम हरी त्रिवेदी

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य , मानव होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य . . . नाम- ओम हरी त्रिवेदी शिक्षा - स्नातक +तकनीकी डिप्लोमा जन्म स्थान - बैसवारा लालगंज , रायबरेली (उत्तर प्रदेश) व्यवसाय - शिक्षक

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