“याद वालिद की”

याद वालिद की

हो गयी पूरी वो ख्वाहिश हर एक बुलंदी पाने की,
रह गयी अधूरी एक सदा,तेरे जैसा हो जाने की
जबसे खोया मैंने उनको, मैं और कुछ ना हो सकी,
रब की छोडो मेरे वालिद, मैं खुद की ना हो सकी
हर एक कहानी रोई थी, रुखसती पे आपकी,
पर मेरे आंसू ना निकले, मैं बेटी जो थी आपकी
जो हूँ आज मैं ,वो आप हो हर वक़्त में.
आपकी ही बेटी हूँ,प्यार हो या सख्त में.
आज भी सलामती की लबो पे मेरे दुआ है,
आपके बाद ही मैंने वालिद, “मगरिब” को छुआ है.
मगरिब हो या लम्हे हो, सब गम हैं मेरे वाकिफ से.
मजहब हो या अजहर हो, सब कम हैं मेरे वालिद से.

श्रेयस अपूर्व”मगरिब”
भोपाल

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