‘ याद ‘

वो पल थे बड़े मधुर ,
जा खड़ा हो तुमसे दूर ,
मै तुमको ही ; देखा करता था..

समेट लिये होते कुछ पल ,
जो लगता जैसे हो अपना कल ..

मखमल सी चेहरे की छवि ..
जो अब भी नही होती ओझल.

मेरे साथ ही होते वो हर पल.
और नींद ना होती जब रातों मे ,

बँद आँख से देखा करता था ..
बस याद तुम्हे मै करता  था..
“बस याद “..

ना सुनी कभी आवाज़ तेरी ..
पर बात मै, तुमसे  करता  था .

एक आश उठी,उठ जीने की  ..
जो तन्हा दुनिया मे मरता था .

सपनों के संसार गढे ,
वो संसार हमारे संग ,
बस एक हे घर मे बसता था ,
“बस याद”…

सोचा तुम्हे दिखाऊँ तो ,
तुम खुद ही अंदर आओगी ,

बावला हो गया था मै शायद.
पांव बढा कर आगे क्यों ?
मै खुद को रोका करता था .

जान भी होता देने का जज़बा,
जाने तुमसे क्यों डरता था ..

धड़कन बढ़ जाती थी मेरी ,.
कभी थमी-थमी रह जाती थी,
जो पास तेरे मै होता था…
“बस याद”….

भूल गया था तेरी याद मे मै ,
कि दिन रात भी कोई होता है…
बस याद तुम्हे मै करता था ..
“बस याद”…

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