यार बचपन तू कहाँ खो गया

घनन-घनन गरजते मेघ
काली घटाओं की मस्ती
वो रिमझिम वर्षा का पानी
वो कागज की टूटी कश्ती
बचपन यार तू कहाँ खो गया
मुझे जगाकर तू क्यों सो गया

 वह कटी पतंग को झपटना
वो छीना-झपटी में उलझना
यारों की पतंग को काटना
फिर झगड़ों का सुलझना
बचपन यार तू कहाँ खो गया
न जाने कहाँ तू गुम हो गया

लुका-छिपी की वह दोपहर
वो होली का महकता रंग
वो शिकायतों का अनंत दौर
अपने रूठे हुए यारों के संग
बचपन यार तू कहाँ खो गया
आज तू याद आया तो रो गया

ताल कटोरा गार्डन जाकर
वो कच्ची अमिया चुराना
फिर इंडिया गेट भाग कर
वो जामुन तोड़ मुस्कुराना
बचपन यार तू कहाँ खो गया
वो पल छिन गए तू जो गया

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.