या फिर उससे प्यार करूँ

आते जाते सपनों में
जिसकी चाहत बदरी बनकर
हर रात धुंधलके आती थी

नहीं पता कब बैरी बनकर
मेरे सपनों से मेरी चाहत
खामोश हवा ले उड़ जाती थी

जिसका रस्ता देख देखकर
जागी जागी मेरी पलकें
बोझिल सी हो जाती थी

आज उसी की जुल्फों के
साये में मैं अब लेटा हूँ
बिन जिसके पहले मुझको
नींद नहीं आ पाती थी

संग उसके ये हाल है रहवर
दिल इसी सोच में डूबा है
सो जाऊँ आगोश में उसके
या फिर उससे प्यार करूँ

✍ murari singh
( Begusarai )
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About MURARI SINGH

लिखने की नेमत छीन भी ले, 'गर खुदा किसी गलियारे मे मेरी पहचान रहेगी तुझसे ज़िंदा, कहता है मुझसे दिल मेरा

4 Replies to “या फिर उससे प्यार करूँ”

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