यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

चेहरे को आँचल से ढक कर,
यूँ टुकुर-टुकुर ना मुझे देखा करो।
मेरी आँखों का नूर हो तुम सनम,
यूँ गैर बनकर ना मुझे देखा करो।

मेरे दिल की धड़कन हो तुम,
अजनबी बनकर न धड़का करो।
दिल की बात ग़ज़ल में कहती हो,
यूँ हर बात पर ना भड़का करो।

बनकर हसीं सावन की घटा,
यूँ बादलों को ना सताया करो।
प्यासे दिलों की धड़कन हो तुम,
यूँ गीत विरह का ना गाया करो।

दिल की खिड़कियाँ तोड़ कर,
यूँ मेरे ख़्वाबों में ना आया करो।
दिल की बात दिल को बताकर,
यूँ तड़पाकर फिर जाया ना करो।

अपनी मदहोश नशीले नयनों से,
यूँ शराब ना कभी बरसाया करो।
बुझा दो आज दीवानों की प्यास,
यूँ बूँद-बूँद को ना तरसाया करो।

चेहरे को आँचल से ढक कर,
यूँ टुकुर-टुकुर ना मुझे देखा करो।
मेरी आँखों का नूर हो तुम सनम,
यूँ गैर बनकर ना मुझे देखा करो।

किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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