रिश्ता

रिश्ता

तोड़ना मत रिश्ता
कभी कच्चा मकान देखकर
किसी गरीब का
क्योंकि पकड़
बहुत मजबूत होती है
मिटटी की धरती से
याराना ये
मिटटी और धरती का
पुराना है युगों-युगों से
संगमरमर पर तो अक्सर
पैर फिसलते ही रहते हैं
क्योंकि
क्षणिकहै ये याराना

(किशन नेगी ‘एकांत’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

One Reply to “रिश्ता”

  1. mitti ka rishta mitti se hi hota hai.Bharatiyon ki saralta ka beej mitti me hai, mitti bhed nahi karati. Bahut khubsurat abhiwyakti.

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