रे दर्पण तू झूठ न बोले

रे दर्पण तू झूठ न बोले

जीवनकाल के इस लम्बे सफर में
देखे हैं अनगिनित उतार-चढ़ाव की ढलानें मैंने
एक दिन अनायास ही
क्लान्ति की रेखाएं लगी उभरने
मेरे परिश्रांत मुखाकृति पर
मन ने कहा कि तनिक रुक, और
विराम दे अपनी दिशाहीन यात्रा को
काल की शीतल छाँव में
बिसरा ले और कर विचार कि
तूने इस सफर में क्या खोया-क्या पाया
मैंने कर्मों के दर्पण में निहारा चेहरा अपना
उस धूमिल छवि पर असंख्य परतें धूल की
क्रूर निगाहों से घूर रही थी मुझे
तभी एक हल्की-सी गूँज ने दी दस्तक़ मेरे कानों में
जो कह रही थी कि अपने पंकिल चेहरे को
मांज ले सत्यता के स्वच्छ विचारों से
धोया जब मैंने मलिन चेहरे को तो
हुआ नहीं यकीन स्वयं को कि
ये धूमिल छवि किसी और की नहीं अपितु
मेरी ही थी, मुझे स्वयं पर ग्लानि हुई
जो मैं पहचान न सका अपनी ही तसवीर
शायद उस पर अभिमान, दम्भ, स्वार्थ और
अज्ञानता की धूल भरी झुर्रियां
भर्मजाल के मैले सागर में गोते लगा रही थी और
मिथ्या की मग़रूर लहरें भोंह ताने
उछल रही थी बिन पतवार की कश्ती के
वास्तव में इस भागम-दौड़ की ज़िन्दगी में
इतनी भी फुर्सत न मिली कि
अपनी ही छवि को पहचान सकूं
आज समय के दर्पण ने ही मुझे
मेरे यथार्थ का दर्पण दिखाकर
मेरी वस्तु-स्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण दिया

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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