रे पथिक तनिक तू सुनता जा

रे पथिक तनिक तू सुनता जा

मैं नीलकंठ हलाहल हूँ
पी मुझको शिवपद पाता जा
जब मन- धरा-गगन प्रदुषित हों
तू जटा जूट प्रलयंकर बन जा
रे पथिक तनिक तू सुनता जा…..
मैं पाच्जन्य सा महाशंख हूँ
सत्य-असत्य के महासमर मे
मुझको तू गूँजाता जा
मन सारथि कृष्ण बनाता जा
रे पथिक तनिक तू सुनता जा…….
मैं चक्रों में सहत्रचक्र हूँ
तु कमलदल खिलाता जा
शिव शक्ति के मिलन क्षण में
तू स्वयं का परिचय पाता जा
रे पथिक तनिक तू सुनता जा…….

About पूनम सिन्हा

M.Sc. Zoology

3 Replies to “रे पथिक तनिक तू सुनता जा”

  1. वाह !!!!!!!!आदरनीय पूनम जी — दिव्य पलों में रची गयी सुंदर अध्यात्मिक रचना | सुंदर उद्बोधन!!!!!!!!!स्र्श्ना से परे !!!सस्नेह बधाई |

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