रे मनुआ! अब तो धीरज धार

रे मनुआ! अब तो धीरज धार

क्यों होता व्याकुल इतना, व्यथा होता क्यों बेचैन
चैतन्य को बना सारथी, सूर्यरथ होकर पर सवार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
भोर भई अब आंखें खोल, बावरे क्यों तू सोवत है
पतवार संभाल अपनी, कश्ती है तेरी मंझधार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
प्राण पखेरू हो जायेंगे जब, कब तू जागत है
सह ले पीड़ा अपनी, कोई ना सुने तेरी पुकार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
अपनी पीड़ा तू ही जाने और न जाने कोई
टूटी है वीणा तेरी, संवार ले इसके टूटे तार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
घनघोर अँधेरी रात में, विपदा खड़ी है सामने
संभाल स्वयं को तू, उठा खडग कर दे प्रहार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
दिल के टूटे तार तेरे, देने लगे हैं ग़मगीन सुर
तनिक ठहर ज़रा तू और सुन ले इसकी झंकार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
घायल हुआ तेरा मानस, जख्मी हुई तेरी चेतना
दर्पण में देख धुंधला चेहरा, तक़दीर अपनी संवार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार
रे मनुआ! अब तो धीरज धार

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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