रे मुसाफ़िर! रुकना तेरी नियति नहीं

रे मुसाफ़िर
चलना तेरा काम
रुकना तेरी नियति नहीं
तू स्वयं अपना भाग्यविधाता
कर्मठ कर्मयोगी बनकर
करले धारण कर्मशील कवच
उमंग तेरा खड्ग
उत्साह तेरा चांदनी रथ
बनाकर ढाल अपने प्रचंड पराक्रम को
बन स्वयं सारथी इस आलोकित रथ का
और झोंक दे स्वयं को
कर्मों के इस अग्नि-कुंड में
पसीना बहेगा-बहने दे
लहू बहेगा-बहने दे
शैल शिखर बनकर ललकारना
उस आंधी और तूफान को
जो करे दुस्‍साहस तेरे कर्मपथ पर
बनकर निर्भीक सिपाही
पायेगा अवश्य तू अपनी मंज़िल
गायेंगे मंगल गीत चाँद और सूरज और
गूंजेगी हर्षध्वनि तेरे विजयपथ पर
हिमगिरि के उतुंग शिखर बैठ आज
भाग्य भी तुझे निहारता
मगर रुकना तेरा कर्म नहीं
डिगना तेरा धर्म नहीं

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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