लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

चांदनी रात में मुस्कुराते हुए चाँद को देख
पत्नी के दिल में प्रेम के बादल बहकने लगे
जैसे किसी रूठे हुए बांसुरी के अनजान सुर
बसंत के आँगन में खुशबु बन महकने लगे
फिर बोली साजन से बोलो मुझे दो ऐसी बातें
पहली बात से हो जाऊँ मैं ख़ुशी से रसगुल्ला
और फिर कहो बात दूसरी कोई मेरे सनम
सुन कर जिसे हो जाऊँ में तुरंत आग बबूला
सुनो जानम कहता हूँ दिल की पहली बात
देखा है जब से चाँद तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो
नहाये जब ये चाँद झील-सी नीली आँखों में
तुन उन आँखों की कोई कुंवारी संजीदगी हो
दिल पर रखकर हाथ सुनो अब दूसरी बात
ख़ाविंद हूँ मगर लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर
जब से हुआ गठबंधन इन दो किनारों का
टपकते हैं आब-ए-चश्म ऐसी बंदगी पर
 (किशन नेगी ‘एकांत’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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