वक्त की पुकार

वक्त की पुकार

जमिन अपनी नहीं, हम जमीन के है
क्यों माँ पर अधिकार हम बोले यहाँ
जनम इसपे हमने लिया फिर भी
क्यों दुविधा से खो रहे अपना जहाँ

देखो मिट्टी की खुशबू कैसे
अपने तन मन को जगाती है
ये पेड़, पौधे, फूल, पंछी भी
अपने जीवन को सजाते है

अपने अधिकारों की बात वैसे
सुख से जादा दुःख देती है
जाना है सबकुछ छोड़ यहाँ से
काल पर किसका अधिकार है

लोग झगड़ रहे लड़ रहे
ये धरती का आँगन भूलकर
अभिलाषा की आरजू में कैसे
मानव भाग रहा जीना छोड़कर

दुनिया के मंच पर हर कोई
लेना जानता पर देने की बात नहीं
सुख के बजाए वो दुःख में रोए
जिंदगी का पहलू समझा ही नहीं

चार दिन की जिंदगी फिर जाना है
पल भर की हँसी में कोई बोलता नहीं
हर चीज खरीद ने की चाहत में हमने
असल में जीना कभी चाहा ही नही

अस्थिर बना जग अपने व्यवहार से
तन मन की कहाँ कौन सुनता है
मानवता का गीत नहीं चाहिए
वरदान खुशियों का माँगते है

व्याकुलता का भाव बढ़ रहा
प्राणों का खेल बन गया है
सांस भी लेने की फुरसत कहाँ
पैसा जीने का वजूद हो गया है

भर भरकर खुशियाँ है देखो
इन हरियाली पहाडो पर
तू चल रहा इसे काबू में करने
पवन भी हँस रहा इस मुर्खतापर

जीतनी प्यास उतना तुम पीते नहीं
सब कुछ पाने के भय में दुःख है
उदार भाव निसर्ग का तू समझा नहीं
खुदगर्ज के भाव में बहता जा रहा है

सूरज की किरण भी सिखाती है
नव आशा का तुम सन्देश बनो
तुम प्रकाश की रेखाए समझ लो
भूले हुए अपने कल को जानो

सुनो पंछी गान हो रहा
आज तुम्हारे मन से जाग जाओ
चेहरे पे हो मुसकान जीने की
समाज हित के तुम गीत गाओ

खुद की बात छोड़ दो तुम
ममता कणकण की जी लो
जीवन का सन्देश बनो तुम
वक्त की पुकार सुन लो

 

– Raju Thokal

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