वसुंधरा तब बोल उठी

वसुंधरा तब बोल उठी

दिया है जिसको माँ का अधिकार
हो रहा उसी पर अत्याचार,
लुटता तन होता व्यापार
निकलती है बस आह भरी चीत्कार
ह्रदय में उसके जब अजब सी पीर उठी
वसुंधरा तब बोल उठी ……………………….

जो कुछ भी तुझे नियति ने दिया है
वह मेरा ही सब कुछ है
मुझसे पोषित यह जगत
और मुझसे ही पोषित तू है l

फिर क्यों मेरे उपकारों पर भारी
आज निज स्वार्थो का अम्बार ?
क्यों मेरा हरा – भरा दामन उजाड़ने पर
तुला सकल संसार ?
क्यों निमंत्रित करता मरघट सा विनाश का
धुंआधार ?

आखिर मैं भी तो एक माँ हूँ
माँ जैसा ही सदा स्नेह दिया
मुझसे ही यह सजीव सकल चराचर
जग ने कैसे यह भुला दिया ?
ह्रदय में उसके जब अजब सी पीर उठी
वसुंधरा तब बोल उठी ………………..

आज मेरे अपने ही मेरा सौदा करते है
कहीं होते मुझपे कुठाराघात
तो कहीं आरे मेरे दामन पर चलते हैं
कहीं निर्दयता से मेरी छाती चीरी जाती ,
घोर पतन हैं हे मानव फिर भी तुझे
लाज़ ना आती
सब स्वार्थ में हो चुके हैं अंधे
ना जाने कैसे – कैसे काले ये गौरखधंधे l

सदियों से शोषण होता आया
इस अनमोल विरासत के तन का
इंसान की लालची सोच के कारण
एक असहाँय माँ के मन का l

पर एक दिन वह समय भी आएगा
जब मनुष्य अपनी ही करनी पर पछतायेगा ,
पर शायद तब तक देर हो चुकी होगी
एक माँ अपना सब कुछ खो चुकी होगी

सर्वविदित हैं वशीभूत हो स्वार्थ के
मनुष्य जो अत्याचार प्रकृति पर आज करेगा ,
भविष्य में उसका दुष्परिणाम उसे स्वयं भुगतना पड़ेगा l

सोचो जरा क्या देना चाहोगे अपनी संतानो को
विरासत में –
संघर्ष करती ज़िन्दगी , बीमारी , महामारी,
या फिर एक स्वस्थ पर्यावरण में
स्वस्थ जीवन की सौगात प्यारी l

About ओम हरी त्रिवेदी

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य , मानव होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य . . . नाम- ओम हरी त्रिवेदी शिक्षा - स्नातक +तकनीकी डिप्लोमा जन्म स्थान - बैसवारा लालगंज , रायबरेली (उत्तर प्रदेश) व्यवसाय - शिक्षक

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