विरह की व्यथा

फांस सी खटकती
अंतस मन में
चंचल सी मुस्कान
अब कैसे रास आये
पैजनिया जब गुनगुनाये
ओठों के सहज सहगान
पनघट की डग़र लगे
सुनसान सी बेजान
टूटी पट्टी पे
आतुर है संगम स्नान
अंतस में अटक गई
दिल की धड़कन
बेचैन है मन
सुनने पायल की तान
सूरज की
पहली किरण
जगाती संदेश
मचलता तन
दौड़ पड़े, खोजने
तेरे पांव के निशान
रो रो कर बेहाल
उलझ गई सांसें
धड़कन हुई बेजान
जैसे की थम गया
समय का चक्र
घूमें सारा जहान
ओंठों के अनबोले
सुनना चाहे कान
फांस सी खटकती
अंतस मन में
विरह की व्यथा
कैसे हो बयान
सजन

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