वो कोई और नहीं

वो तूफानी रात
मचलती शीत लहर धुंधली चादर लपेटे
चेतनाशून्य में डूबा रात का सन्नाटा
ख़ामोशी करती पहरेदारी
ऐसी संवेदन-शून्य वीरानी रात में
चला जा रहा था कोई अपनी डगर
जैसे भूल गया हो मंज़िल अपनी
फकत किसी परछाई का अहसाह था
अकस्मात गुजरा एक वाहन
उसी पथ से जिस पथ थी वह सहमी परछाई
अनजान चेहरा कोई
उतरा उस वाहन से, देख उस परछाई को
शायद इरादे भी नेक नहीं
लगा करने कुछ इशारे भद्दे, हरकतें अश्लील
चेहरा कामातुर भाव लिए
परछाई डरी-डरी, सहमी-सी
क़दमों की रफ़्तार तेज कर
दौड़ी जा रही थी, ढूंढने कोना कोई सुरक्षित
कभी चिल्लाती
कभी पुकारती मदद को
मगर इस मनहूस घडी, इस काली रात में
कौन था जो सुनता, बेबस अबला की पुकार
किन्तु उस नरपिशाच ने
जकड़ ही लिया उसे अपने निर्मम पंजों में
तार-तार कर दी अस्मत किसी की
एकाएक आकाश में चमकती बिजली की रौशनी में
देखा दर्दनाक चेहरा उस पीड़िता का, अभागिन का
शैतान को जैसे सन्निपात हो गया
कहीं अदृश्य हो गया कामेच्छा का पिसाच
शरीर सुन्न पड़ गया, मन में ग्लानि भाव
स्वयं से घृणा, धिक्कारता अपने पुरुषत्व को
नहीं हुआ उसे विश्वास कि
जिस अबला की अस्मत उसने लूटी
वो कोई और नहीं
उसकी अपनी लाड़ली बेटी थी
मारे लज़्ज़ा के उस कामुक हैवान ने
अपने ही हथियार से ख़त्म कर दी ज़िन्दगी अपनी
दर्द से कराहती वह आवाज़
कोई और नहीं
उसकी अपनी ही जन्मी संतान थी
उसकी अपनी ही जन्मी संतान थी
(किशन नेगी ‘एकांत’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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