” वो गली “

उस गली का  वह पुराना घर,

जहां बचपन बीती,

जहां ना कोइ रिवाज़ थी,

ना कोई रीति,

और जहां चलती थी केवल,

अपनी ही नीति..

 

वह गली छोड़ अब मै,

मुहल्ले पर खड़ा हूं,

अपनी ही बातों  को लेकर,

कितनों से लड़ा हू…

 

कहते हैं आगे फ़िर,

कोई बड़ा  शहर आयेगा,

और अपने साथ ढेरों,

चुनौतियां लायेगा..

 

पर भरोसा है मुझे खुद पर,

मै अपनी बात कहूंगा,

अब तक लड़ता आया हूं,

लड़ता रहूंगा,

लड़ता रहूंगा…

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