वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।

 

मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी

जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।

 

कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये

जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।

 

घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी

पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।

 

माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी

खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी।

….. भूपेन्द्र कुमार दवे

00000

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.