व्यथा वृक्ष की।

  • क्यो काटते हो मुझे
  • मैं तो जीवन देता हूं
  • स्वयं ना लेकर अपना कुछ भी
  • फल तुमको दे देता हूं।।
  • चोट तुम्हारी कुल्हाड़ी का
  • हर पल सहता रहता हूँ
  • जब तक अंतिम स्वास चलती है मेरी
  • प्राणवायु ही देता रहता हूँ।।
  • फिर क्यों काटते हो मुझे
  • मैं तो हर सुख दुख में काम आता हूं
  • कभी द्वार बन कभी बन खिड़की
  • घर की लाज बचाता हूँ।।
  • पल पल ऐ मनुष्य तू हमको
  • कितने घाव देता है
  • गर्मी के मौसम में शीतल
  • छाँव हम्हीं से लेता है।।
  • फिर क्यों काटते हो मुझे
  • मैं भी तो तुम्हारी तरह
  • इसी धरती माँ की संतान हूँ।
  • ब्रह्मा विष्णु महेश का भेजा
  • प्रकृति का वरदान हूँ।।
  • फिर काटते हो मुझे।।

8 Replies to “व्यथा वृक्ष की।”

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